Friday, July 10, 2026

E-20 ईंधन पर घमासान: “पुरानी गाड़ियां खराब हुईं तो क्या कंपनियां देंगी मुआवजा?” अरविंद केजरीवाल का ऑटो मेकर्स से लिखित जवाब का अल्टीमेटम

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नई दिल्ली:

देशभर में तेजी से लागू किए जा रहे E-20 (20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) को लेकर सियासत और आम जनता की चिंताएं दोनों गरमा गई हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और देश की दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। केजरीवाल ने सीधा सवाल दागा है कि यदि इस नए ईंधन से देश की करोड़ों पुरानी गाड़ियों के इंजन खराब होते हैं या उनका माइलेज गिरता है, तो क्या वाहन निर्माता कंपनियां ग्राहकों को मुआवजा देंगी?

केजरीवाल की 3 मुख्य चिंताएं और मांगें:

  • माइलेज में गिरावट की भरपाई: यदि E-20 पेट्रोल के कारण गाड़ियों का माइलेज 10% से अधिक कम होता है, तो उसकी आर्थिक जिम्मेदारी कौन लेगा?
  • करोड़ों वाहनों पर संकट: देश में चल रहे करोड़ों दोपहिया और चारपहिया वाहन E-20 के अनुकूल (Compliant) नहीं हैं। बिना तैयारी के आम जनता पर नई ईंधन व्यवस्था थोपना आर्थिक बोझ बढ़ाएगा।
  • इंजन डैमेज का रिस्क: एथेनॉल की अधिक मात्रा से पुराने इंजनों के पुर्जों (जैसे रबर पाइप और कोर पार्ट्स) को नुकसान पहुंचने का खतरा है, जिसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

केंद्र सरकार का पलटवार: ‘चिंताएं भ्रामक, देशहित में बड़ा कदम’

दूसरी तरफ, केंद्र सरकार ने इन सभी चिंताओं और आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि:

  • E-20 पेट्रोल को लेकर फैलाए जा रहे दावे पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन हैं।
  • सरकार के पास ऐसा कोई प्रमाण या डेटा नहीं है, जिससे साबित हो कि इस ईंधन से वाहनों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंच रहा है।
  • एथेनॉल ब्लेंडिंग से देश की कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा बचेगी, प्रदूषण घटेगा और देश के किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा।

राजनीतिक गलियारों में बढ़ेगी तपिश

विशेषज्ञों का मानना है कि जहां एक तरफ सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण के लिए ‘मास्टरस्ट्रोक’ बता रही है, वहीं केजरीवाल द्वारा इसे आम आदमी की जेब और पुरानी गाड़ियों की सुरक्षा से जोड़े जाने के बाद यह मुद्दा आने वाले दिनों में एक बड़ा राजनीतिक रूप ले सकता है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ऑटोमोबाइल कंपनियां इस ‘लिखित जवाब’ की मांग पर क्या रुख अपनाती हैं।

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