नई दिल्ली/कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी खींचतान अब खुलकर सार्वजनिक मंचों तक पहुंच गई है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने पहली बार खुलकर प्रतिक्रिया देते हुए इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप “व्यक्तिगत पूर्वाग्रह” से प्रेरित हैं और उनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
दरअसल, काकोली घोष दस्तीदार ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर कल्याण बनर्जी पर संसद के भीतर कथित तौर पर अभद्र व्यवहार, मौखिक दुर्व्यवहार और महिलाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां करने के आरोप लगाए थे। उन्होंने अपने पत्र में दावा किया था कि कल्याण बनर्जी का व्यवहार केवल उनके प्रति ही नहीं, बल्कि महिला सांसदों के प्रति भी अनुचित रहा है। काकोली ने इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष से हस्तक्षेप करने और उचित कार्रवाई करने की मांग भी की थी।
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कल्याण बनर्जी ने कहा कि काकोली घोष के आरोप उनकी “निजी सोच और पूर्वाग्रह” का परिणाम हैं। उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में ऐसा कोई मामला था तो इसकी शिकायत तत्काल संबंधित मंच पर की जानी चाहिए थी। उनके मुताबिक, काफी समय बाद इस तरह के आरोप लगाना कई सवाल खड़े करता है।
कल्याण बनर्जी ने आरोपों को “झूठा, मनगढ़ंत और बाद में गढ़ी गई कहानी” करार देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य उनकी छवि को नुकसान पहुंचाना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पार्टी के भीतर चल रहे मतभेदों के बीच इस तरह के आरोपों को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जाना चाहिए।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब तृणमूल कांग्रेस पहले से ही अंदरूनी असंतोष और गुटबाजी की खबरों को लेकर सुर्खियों में है। हाल के दिनों में पार्टी के कई नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी देखने को मिली है, जिससे विपक्ष को भी टीएमसी पर निशाना साधने का मौका मिल रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते इन विवादों को नियंत्रित नहीं कर पाया, तो इसका असर संगठनात्मक एकजुटता पर पड़ सकता है।
हालांकि, फिलहाल यह मामला आरोप और प्रत्यारोप के स्तर पर है। लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष की गई शिकायत और उससे जुड़े तथ्यों की जांच या संभावित कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। काकोली घोष अपने आरोपों पर कायम हैं, जबकि कल्याण बनर्जी ने उन्हें पूरी तरह खारिज कर दिया है।
ऐसे में यह विवाद केवल दो सांसदों के बीच का व्यक्तिगत मतभेद नहीं रह गया है, बल्कि इसे तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभर रहे असंतोष और बदलते राजनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस पूरे मामले को किस तरह संभालता है, यह बंगाल की राजनीति के लिए अहम साबित हो सकता है।