नई दिल्ली: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आर्थिक संकट, बेरोजगारी और राजनीतिक असंतोष के बीच विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों की खबरें सामने आई हैं, जिनमें कई लोगों के मारे जाने और घायल होने की जानकारी है। इन घटनाओं के बाद एक बार फिर कश्मीर विवाद और संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत द्वारा अपनाए गए कानूनी रास्ते पर चर्चा शुरू हो गई है।
भारत ने UN में किस आधार पर उठाया था मामला?
1 जनवरी 1948 को भारत ने पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलों की शिकायत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दर्ज कराई थी। भारत ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र चार्टर के चैप्टर-6 के तहत उठाया, जो विवादों के शांतिपूर्ण समाधान से जुड़ा है। इस अध्याय के तहत सुरक्षा परिषद बातचीत, मध्यस्थता और अन्य शांतिपूर्ण उपायों की सिफारिश करती है। इसके तहत पारित प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।
चैप्टर-6 से भारत को क्या मिला?
कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में जनमत संग्रह का उल्लेख किया गया था, लेकिन उससे पहले पाकिस्तान के लिए अपनी सेना और कबायली लड़ाकों को जम्मू-कश्मीर से पूरी तरह हटाना पहली शर्त रखी गई थी। भारत का लगातार यही रुख रहा कि पाकिस्तान ने यह शर्त कभी पूरी नहीं की, इसलिए आगे की प्रक्रिया लागू नहीं हो सकती। चूँकि ये प्रस्ताव चैप्टर-6 के तहत थे, इसलिए भारत ने उन्हें बाध्यकारी आदेश नहीं, बल्कि सिफारिश माना। यही तर्क बाद में 1972 के शिमला समझौते के बाद कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा मानने के भारत के रुख को भी मजबूती देता है।
अगर चैप्टर-7 के तहत जाता मामला तो क्या होता?
चैप्टर-7 उन परिस्थितियों से संबंधित है जहाँ अंतरराष्ट्रीय शांति को खतरा, आक्रमण या युद्ध जैसी स्थिति हो। इसके तहत सुरक्षा परिषद के फैसले कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।
यदि कश्मीर का मामला चैप्टर-7 के तहत जाता, तो सुरक्षा परिषद युद्धविराम लागू कराने, सेनाओं की वापसी के निर्देश देने, आदेश का पालन न करने पर प्रतिबंध लगाने और कुछ परिस्थितियों में शांति सेना तैनात करने जैसे कदमों पर विचार कर सकती थी। ऐसे में भारत और पाकिस्तान दोनों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैसलों का पालन करने का दबाव अधिक होता।
क्या इससे भारत को फायदा होता?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा जवाब देना आसान नहीं है। यदि सुरक्षा परिषद पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से आक्रमणकारी घोषित कर देती, तो उस पर अधिक अंतरराष्ट्रीय दबाव बन सकता था। हालांकि, 1948 में शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी और सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य अपने-अपने रणनीतिक हितों के अनुसार फैसले लेते थे। इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि चैप्टर-7 के तहत निर्णय पूरी तरह भारत के पक्ष में ही जाता।
PoK पर भारत का आधिकारिक रुख
भारत का स्पष्ट और लगातार यही रुख रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है। भारत यह भी कहता है कि संयुक्त राष्ट्र के शुरुआती प्रस्तावों की पहली शर्त—पाकिस्तान द्वारा कब्जे वाले क्षेत्रों से अपनी सेना और लड़ाकों की वापसी—कभी पूरी नहीं हुई, इसलिए उन प्रस्तावों के अगले चरण लागू नहीं हो सके।
